Sunday, September 28, 2014

-----------------------क्रांति-कुल-कलियुग-कन्हैया "भगत सिंह" ---------------





ओ! युवता के 
प्रकाशस्तंभ
भगत!!

सड़क पर सोया हुआ
आदमी बुरा लगता है

ब्रांडो के पीछे भागता
युवा बुरा लगता है
रखैल से रतिरत
अधेड़ बुरा लगता है
पतले रिक्शेवाले के रिक्शे पे
बैठा मोटा बुरा लगता है



ओ!मृत्युविजेता
भगत!!


तथाकथित शाइनिंग इंडिया

अच्छे दिन,भारत निर्माण
अब बहुत बुरा लगता है
एकांगी व्यवस्था के
नियोजन से
विदर्भ,नंदीग्राम
में मरता हुआ किसान
बुरा लगता है
किसी कंपनी के प्रचार में
दांत चीयारे नायक बुरा लगता है



ओ!उच्च चेतना
भगत!!



फिर आ जाओ
करो एक धमाका फिर से
बहरों को सुनाने के लिए
बतलाने कर लिए
संवृद्धि और विकास में अंतर होता है
चेताने के लिए
संवृद्धि के बने द्वीप और
असह्य भूख से पेट पर कपडा बांधे
व्यक्ति में अंतर होता है !!!!!!



.....आनंद सावरण.....

Saturday, February 15, 2014

-------तुम हो गयी हो अब कलंकित------


                       
तुम
हो गयी हो कलंकित
यूँ अकारण अब
विलाप नहीं सुहाता 
तुम पर
तुम जाती थी
उससे मिलने,बतियाने
ऐसा क्या कह आती थी
जो मैं गा उठता था



खैर!
मेरी छोडो
अपनी समझो
सुना था तुम
क्रांति लाती हो
क्या वहां भी
कर लिया स्वत्व का सौदा


अरे कविता!!
तुम तो भावना की बहन हो
आदर्श की बेटी हो
परिस्थितियां तुमने बदली
अब ये अधोपतन


खैर!!
इसे भी छोडो
सुना था तुम
व्याकरण की
परिधि में नहीं रहती
वैयाकरणों ने
वहां भी की कोशिश
तुम्हे बांधने की
तुम भी चढ़ाई गयी
खरे और खोटे की
कसौटी पर
छीनी गयी तुम्हारी
स्वतन्त्रता


खैर!!
तुमसे इतनी उम्मीद क्यूँ??
नारी हो न
द्वापर में
कृष्णा के रहते
होगा ही चीर हरण
त्रेता में
राम ही लेंगे
तुम्हारी अग्नि परीक्षा
और कलियुग में
तुम्हारे ही रक्षक
बिकाऊ कलमची
बचा न पाएंगे
तुम्हारी अस्मिता


होगा खिलवाड़
तुम्हारे ही अंतर से
कब से रो रही हो
अब तो मौन साधो
अपनी उस
परम्परा के लिए
जिसमे कबीरा,तुलसी
और मीरा थे!!!
---आनन्द सावरण ----

Tuesday, March 6, 2012

----------मैंने देखा--------------

मैंने देखा
एक भूखा बच्चा
अपने दुर्बल माँ की छाती से लिपटा हुआ
मैंने देखा
एक प्रसिद्द साधू
सोने चांदी की कुर्सी में चिपका हुआ
मैंने देखा
एक बूढा बाप
अपने जवान बेटे की लाश उठाये हुए
मैंने देखा
एक प्रसिद्ध समाज सेवी
फर्जी संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन करवाए हुए
मैंने देखा 
एक धनी व्यक्ति
एक वैश्या पर रूपया लुटाते हुए
मैंने देखा 
एक छोटा बच्चा 
पढने की उम्र में रिक्शा चलाते हुए 
मैंने देखा 
एक धनी बुड्ढा
एक गरीब लड़की से व्याह रचाए हुए
मैंने देखा
एक आदर्श विद्यार्थी 
सिगरेटे के धुएं से छल्ले बनाए हुए  
  ----आनंद सावरण-----

Sunday, February 19, 2012

------अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा एक नहीं शत बार लिखूंगा ----

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा

नहीं करना अब कोई त्राण
वेदीबलि पर न्यौछावर प्राण 
न अब बाकी प्रमाण आना है 
अब होगा करना प्रयाण 

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा 

उत्सर्ग करना होगा तोशक
बनना है समाज का पोषक
अब नायक बन सामने आना है
छोड़ना होगा यह पात्र विदूषक 

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा 

न करना अब कोई द्वेष
उठा है अब युयुत्सा त्वेष
जीतना है,जीत  ही जाना है
जो समर पड़ा था अब तक शेष

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा 
  
अपरिभाषित भी हुआ परिभाषित 
क्रान्ति हुयी है फिर से पिपासित  
शोर्य पुत्र बन सामने आना है
सदियों का मौन भी होगा सुभाषित

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा  
----आनंद सावरण---



Sunday, January 22, 2012

पीर पुराण के आगे प्रणय गान की पुस्तक मोटी है

तेरे झूठ को भी सच
मान कर आँखे रोती हैं
सबकी सच बातें भी मेरे
विश्वास के आगे छोटी हैं  
प्रतिभा भी आज चन्द
सिक्कों के आगे छोटी होती है 
देखो आज टूटता जाता दीपक
बुझती जाती ज्योति है 
कुछ  भी हो,कैसा भी हो पर   
पीर पुराण के आगे सदैव ही 
प्रणय गान की पुस्तक मोटी है
                                         ----आनंद सावरण ----  

Friday, November 11, 2011

--------------------प्रयाण ---------------

झंझावातों
              हाहाकारों के बीच 
बुझती हुयी दीपशिखा 
सामाजिक अनाचार  
लुप्त प्राय आचार 
मूक संवेदना
                  असहाय वेदना
किंकर्तव्यविमूढ
                    न्यायपथारूढ़
कुछ कर भी पायेगा 
                     या दीपक बुझ जाएगा?
आत्मा के तेल 
                   और प्रज्ञा की बत्ती से 
                                  जलेगा
माम ओर से न बचेगा 
हाथ भी जलेगा 
                   लौ हो प्रज्वलित इतना 
                    झंझावत हो चाहे जितना
फर्क न पड़े
रहे पथ पर अड़े 
                   स्वयं को जलाओ
                   प्रकाश फैलाओ
दीप संदीप प्रज्वलित कर
बुझों को जलाओ
                   बनो ऊर्ध्वरेखा 
बनाओ प्रणेता 
व्यक्तित्व के मान का
समाज के उत्थान का
स्वतन्त्रता के गान का 
                  यही है क्षण
                तुम्हारे प्रयाण का  
                                   -----आनंद सावरण----

Thursday, September 8, 2011

---मेरे हर शब्द में तुम ही तुम समाई हो...... ---

तेरे साथ हुआ जीवन आज फूलों के रंगों में 
मन आज नाचे गोया सागर बीच तरंगों में
                                                                यौवन आ रहा आज देखो फिर से उमंगों में
                                                                भावनाएं उड़ रही हैं आज गगन बीच पतंगों में
मेरे गीतों में तुम फिर से आज आई हो
साथ तुम आज नयी फिर से महक लायी हो
                                                              मेरे अंतस की तुम बनी आज परछाईं हो
                                                              मेरे हर शब्द में तुम ही तुम समाई हो......
                                                                                                  ---आनंद सावरण ---