Thursday, September 8, 2011

---मेरे हर शब्द में तुम ही तुम समाई हो...... ---

तेरे साथ हुआ जीवन आज फूलों के रंगों में 
मन आज नाचे गोया सागर बीच तरंगों में
                                                                यौवन आ रहा आज देखो फिर से उमंगों में
                                                                भावनाएं उड़ रही हैं आज गगन बीच पतंगों में
मेरे गीतों में तुम फिर से आज आई हो
साथ तुम आज नयी फिर से महक लायी हो
                                                              मेरे अंतस की तुम बनी आज परछाईं हो
                                                              मेरे हर शब्द में तुम ही तुम समाई हो......
                                                                                                  ---आनंद सावरण ---

Wednesday, May 25, 2011

---तेरे संग हूँ, पर जो दूरी है समझता हूँ---

 तेरे संग हूँ पर जो दूरी है समझता हूँ
 कुछ तेरी कुछ अपनी मजबूरी समझता हूँ
                                                           समझ कर भी नहीं हूँ मैं कुछ भी मैं यूं समझ पाता 
                                                            मैं तुझमे खो गया इतना की खुद को पा नहीं पाता
 हो तुम मुझसे दूर पर तुमको दूर मैं मान लूं कैसे?
 मैं प्राणों को अपनी श्वासों से दूर जान लूं कैसे?
                                                            तू ही बता अब इन गीतों को मैं पहचान दूं कैसे?
                                                            तेरे ही इन गीतों को मैं अपनी तान दूं कैसे? 
                                                                                           ---आनंद सावरण---

Sunday, May 22, 2011

-----नारी सशक्तिकरण----

नारी!तुम केवल श्रद्धा हो,विश्वास रजत नग पग तल में 
पीयूष श्रोत ही बहा करो;जीवन के सुन्दर समतल में

उपर्युक्त पंक्तियाँ प्रसाद (जय शंकर प्रसाद)जी ने लिखी नहीं अपितु यह वाक्षणयमान है कि नारियों के प्रसादपर्यंत यह पंक्तियाँ उनकी लेखनी से नारी को परिभाषित करने के लिए स्वतः फूट पड़ी हैं|
नारी, त्याग,प्रेम,बलिदान,ममता,समर्पण,वफ़ा आदि भाव आत्मसात किये हुए है उसे एक शब्द में श्रद्धा कह देना ही उचित है |आज हमारे  परिवारों की धुरी भी नारी ही है|हमारे घर के पर्यावरण,सारे सामाजिक सरोकारों के पीछे भी नारी शक्ति ही विद्यमान है|नारी ही ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है |
आज से नहीं बल्कि हम ऋग्वैदिक काल को भी देखेंगे तो पायेंगे की मैत्रेयी,पुष्पा जैसी भी नारियां हमारे समाज में थीं जो अपने ज्ञान के बलबूते पर सद्भाव और वसुधैव कुटुम्बकम की बात करती थी|
नारियों को हमारे समाज में पहले से ही अच्छी स्थिति प्राप्त है|भारत में तो पहले से ही "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ,रमयंते तत्र देव " अर्थात जहां नारी  कि आराधना होती है वहाँ देवताओं का निवास होता है,को मान्यता प्राप्त है|
आज की नारी अबला नहीं अपितु सबला है|नारी की सशक्तिकरण के नाम पर उसको आरक्षण या आवश्यकता   से अधिक सुविधायें  देकर उसको कमज़ोर नहीं करना है ,बल्कि उसको और सशक्त बनाने के लिए उसके अंतर्मन को जगाना होगा उसको रानी लक्ष्मीबाई,पन्ना धाय,हाडा रानी की याद दिलानी होगी| 
आज हमारे परिवारों में भी मैत्रेयी,पुष्पा,लक्ष्मीबाई विद्यमान हैं,आवश्यकता सिर्फ उनको पहचानने की है|इसी भाव को शब्दों के माध्यम से मुखरता देते हुए किसी कवि ने कहा है-

पूरी ज़मीन साथ दे तो और बात है
हम (पुरुष ) नारियों का साथ दें तो और बात है| 
चल तो लेते हैं लोग एक पाँव  पर 
पर दूसरा साथ दे तो और बात है||  
                                               ---आनंद सावरण ---

Monday, April 18, 2011

----चाँद का मुंह टेढा है----















आसमान में चमकता चाँद 
अपनी फीकी मुस्कान संजोये 
सैलाब बनकर उमड़ता है 
लोगों की कल्पनाओं में
उनके हृदायांकुर से
फूट पड़ती हैं 
संबंधों और भावनाओं की
कपोल कल्पनाएँ
कभी मामा बनकर 
बच्चों को कराता है दुग्धपान 
तो कभी खिलौना बन 
बहलाता है उनका मन 
कभी बनता है 
प्रेमियों के लिए 
प्रेमिका का मुख मंडल
कभी बनाता है
करवाचौथ में स्त्रियों का पूज्य 
पति की उम्र बढाने को 
तो कभी बनता है पोस्टमैन 
भाइयों तक पहुचाता है
बहनों का सन्देश
पर कभी-कभी 
चाँद बनकर उभरता है
टूटे दिलों में असहनीय दर्द 
और कभी अपनी सुन्दरता के लिए
बन जाता है इर्ष्या का पात्र 
जब कहीं से कोई "मुक्तिबोध"
कहता है
चाँद का मुंह टेढा है 
                            ---आनंद सावरण ---

Sunday, April 10, 2011

---अन्ना के सत्याग्रह पर एक विचार ---

आज पता नहीं क्यों मन में यह द्वंद्व उठ रहा है,कि हमारे समाज सेवियों को अपने ही राष्ट्र,अपनी ही मिटटी,अपने ही लोगों के बीच,अपने ही देश की राजनीति से अपनी ही बात मनवाने के लिए भूख हड़ताल या सत्याग्रह जैसे आन्दोलन करने पड़ रहे हैं?आखिर क्यों आज हम अपने को इतना विवश महशूस कर रहे हैं?
आज लोग अन्ना हजारे को गांधी जी का दूसरा रूप मान रहे हैं,क्योंकि अन्ना और राष्ट्रपिता के अपनी बात मनवाने के तरीके लगभग एक सामान हैं,फर्क सिर्फ इतना है की गांधी जी अपनी बात मनवाने के लिए अंग्रेजों से,विदेशियों से सत्याग्रह करते थे और आज का गाँधी अपनों के ही सामने विवश है|
  जब आज सरकार "लोकपाल विधेयक"बनाने के लिए अन्ना के समक्ष प्रस्तुत है तो अन्ना इस सत्याग्रह को स्वतन्त्रता की दूसरी लड़ाई स्वीकार करते हैं,अब मान में यह प्रश्न स्वतः जन्म लेता है कि अपनों से कैसी स्वतंत्रता?यदि हम अपनों से स्वतंत्र होने का प्रयास करेंगे तो हम स्वतंत्र नहीं अपितु "स्वछन्द" कहलायेंगे|तब "स्वतन्त्रता" और "स्वछंदता" इन दोनों शब्दों का अर्थ ही गौण हो जाएगा|
भारतीय समाज,हमारे देशवासी,अन्ना में आज राष्ट्रपिता तलाश रहे हैं,और अन्ना हमें अपनों से ही स्वतंत्र कराने का प्रयास कर रहे हैं,तो क्या १९५० में हमारे अपने ही देश के नेताओं द्वारा,बुद्धिजीवियों द्वारा दिया गया तंत्र ही गलत है?क्या उन लोगों ने हमारे हांथों में स्वतत्रता की जगह परतंत्रता का परचम थमाया है?
लोग अन्ना जी की  तुलना गांधी जी से कर रहे हैं,गांधी जी अंग्रेजों से स्वतन्त्रता की लड़ाई लादे ठेयौर हमारे हांथों में लोकतंत्र जैसा मज़बूत तंत्र थमाए थे,तो क्या गांधी जी,आंबेडकर जी ,नेहरू जी द्वारा बनाया गया संविधान ठीक नहीं था?
आखिर क्यों?आज का गांधी (अन्ना) को अपनों से ही सत्याग्रह करना पड़ रहा है?आज का गांधी क्यों अपने आप को असहाय और विवश महशूस कर रहा है?
क्या १९५० से बनी हुयी व्यवस्था से उपजी हुयी दुर्व्यवस्था के हम ज़िम्मेदार नहीं हैं?न अपनी जगह गांधी गलत हैं और न ही अपनी जगह अन्ना गलत हैं|गांधी जी लड़े थे स्वतन्त्रता के लिए और अन्ना लड़ रहे हैं स्वतंत्र भारत में भ्रष्टाचार से स्वतन्त्रता पाने के लिये|
इस व्यवस्था से उपजी दुर्व्यवस्था के मूल में कहीं न कहीं हम स्वयं ही हैं,यहाँ इस दुर्व्यवस्था की गिरफ्त में सबसे ज्यादा आम आदमी ही है|सरकार योजनायें हमारे लिये बनाती है,जिससे हम उनका उपयोग कर के अपना जीवन व्यवस्थित धग से व्यतीत कर सकें|परन्तु ये योजनायें कब आयीं और कब गयीं किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती,क्या हममें जागरूकता की कमी नहीं है,गग्रूक्ता के मूल में शिक्षा है|आज भी हमारे देश के राष्ट्रीय राजमार्गों से ५ कि.मी. नीचे जाने पर हमें अपने देश की शिक्षा का पता लग जाता है,आज होटलों में बच्चे काम करते हुए देखे जाते हैं,हमारी सरकार ने इसके लिये भी (शिक्षा का अधिकार)योजना हमारे लिये बनाई है|जिसमें ६ से १४ वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा का निःशुल्क प्रावधान है, परन्तु हम उसका उपयोग नहीं करना जानते,जब हमारे समाज में शिक्षा नहीं होगी तो जागरूकता का प्रश्न अपने आप ही समाप्त हो जाता है,और जब जागरूकता नहीं होगी तो हम एक सही सरकार कैसे चुन सकते हैं?जब हमें ज्ञान ही नहीं है कि कौन प्रत्याशी सही है और कौन गलत?
फिर भी यह देख कर अच्छा लगता है कि हमारे देश में धीरे-धीरे पारदर्शिता बढ़ रही है|हमारे पास (सूचना का अधिकार,लोकवाणी ) जैसी शक्तियां हैं|परन्तु हम यदि शिक्षित  ही नहीं होंगे तो हमारे लिये इन प्रावधानों का क्या मतलब है?
आज हमारे देश में भ्रष्टाचार ने एक व्यापक रूप ले लिया है,यदि ध्यान देंगे तो पता लगेगा कि कहीं न कहीं इस व्यवस्था से उपजी हुयी दुर्व्यवस्था के मूल में हम लोग ही हैं,ऐसे में कोई अन्ना या गांधी क्या कर सकता है?ऐसे ही समाया का पूर्वानुमान शायद कवी इकबाल ने कर लिया था तभी उन्होंने कहा था-
     "संभल जाओ ऐ हिन्दोस्तान वालों,
      क़यामत आने वाली है 
      तुम्हारी बरबादियों के तस्करे हैं आसमानों में|
      ना संभलोगे तो मिट जाओगे एक दिन,
      तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में||" 
फिर भी आशा कि किरण अभी बाकी है.स्थिति को बद से बदतर होने से बछाया जा सकता है|लेकिन इसके लिये हमको आपसी भेदभाव भूलकर,प्रेमपूर्वक,राष्ट्रीयता के भाव में रमकर,दृढ़ प्रतिज्ञ आज एक साथ स्थितियों को बदलने का प्रयास किया जाना चाहिए|ऐसी  स्थति पर राष्ट्र कवि श्री मैथली शरण गुप्ता जी द्वारा प्रणीत नमन पंक्तियाँ अक्षरसः उपयुक्त प्रतीत होती हैं-
       "हम कौन थे, क्या हो गए हैं,और क्या होंगे अभी|
        आओ विचारें आज मिलकर हल होंगी समस्याएं सभी||"
                                                                                                                           ---आनंद सावरण ---

  

Thursday, March 31, 2011

दो चार पलों का मिला प्रकाश प्रभु से उपहार सखे
न रोको खामोशी के तालों से
भाव किरण का आना जाना 
उर विहाग को उड़ने दो
स्वछन्द विचारों के नभ में
अंतस में चमक रहा जो हीरा
मत रोको उसका बाहर आना 
                                      ---आनंद सावरण---

Tuesday, March 22, 2011

---------कशमकश --------

जिन फूलों को खिलना न था 
कैसा शिकवा उनके मुरझाने पर
जो रिश्ते कभी अपने ही न थे
कैसा शिकवा उनके टूट जाने पर
वक़्त की आंधी ने पर कतरे हों जिस तितली के
कैसी शिकायत उसके न उड़ने पर
जो वस्तु थी हमसे अधिकारातीत 
कैसा गिला उसके खो जाने पर
जिस ख़ुशी पर मेरा नाम लिखा न हो प्रभु ने
कैसा गिला उसके न मिलने पर                                             
                                          ---आनंद सावरण---