Saturday, August 22, 2015

---- तुम भी रचनाकार थे ???---

हम दोनों रचनाकार थे
मैं लगा करने
रचना निर्माण
तुम लगे करने
आडम्बरों का श्रृंगार 
मेरा प्रणयन अभी तक अधूरा है
सुना तुम्हारा श्रृंगार हुआ पूरा है 
तुम्हारी रचनाधर्मिता कैसी है???
----आनंद सावरण ----

Monday, February 16, 2015

---------बागी अभी भी बगावत के गुमान में है----------


एक परिंदा अभी उड़ान में है
और तीर हर शख्स की कमान में है
उस पर गजब यह कि बागी
अभी भी बगावत के गुमान में है
देख कर दुनियां की तकलीफें 
ऐ तथागत दिल छोटा मत कर
इंसानियत अभी भी जहान में है 
पैरों में है फटी जूतियां,जेब खाली 
तो क्या? मियां, शायर के ख्याल 
अभी तलक आसमान में हैं 
महबूबा हो चली है रकीब के संग
अभी भी इनकी जवानी अटकी 
इश्क़ के ही इम्तेहान में है ...
-----आनंद सावरण -///

Friday, November 28, 2014

----------"क्रांति-गीत" ----------

साथी!!
आओ क्रांति करते हैं
विरोधी गीत गाते हैं
युवाओं को तलासने दो अपना अस्तित्व
इश्किया इक्षाओं में 
सर पे खड़ी मौत को नाम लिखाने दो
अहिंसा के रजिस्टर में
पुरुषार्थ को होने दो परिभाषित
तितलियों को मसलने में
कवि को रचने दो क्रांति गीत
वातानुकूलित कमरे में
साथी!!
आओ क्रांति करते हैं
विरोधी गीत गाते हैं 
---- आनंद सावरण ---

Friday, October 17, 2014

-----जब से स्वप्नों में तुम आने लगी-----







जब से स्वप्नों में तुम आने लगी
कल्पना भी तभी अर्थ पाने लगी
शब्द शब्द हैं मुखर मौन है व्याकरण
लेखनी भी तुम्हे गुनगुनाने लगी 

तुम जो आये तो हर्षित हुयी ज़िदगी
प्रीती भी तुम पे हुयी मोहित ज़िंदगी
भर अश्रु अंतस भटक रहे थे कभी
नेह लाये आप्यायित हुयी ज़िन्दगी
~~~~~आनंद सावरण ~~~~~

Wednesday, October 1, 2014

-----------------------------बापू हमें तुम्हारी याद आती है---------------


गांधी

हमें तुम्हारी याद आती है
बापू
हमें तुम्हारी याद आती है
जब-जब
समाज का होता है
नैतिक पतन
किसी के कुकृत्य के कारन 
कोई ओढ़ता है कफ़न 
गांधी!
तुम्हारी याद आती है
बापू तुम्हारी याद आती है
जब-जब
अपनी माँ के प्रसाद का 
अहर्निश रक्षक 
सर अर्पित कर लौटता है घर
तब-तब
गांधी
तुम्हारी याद आती है
जब-जब
कोई
छुद्र राजनितिक लाभ के लिए
तदर्थ रूप से 
ओढ़ बैठता है
तुम्हारे दर्शन वाली चादर
और
होता है गांधीवाद असफल
तब बापू
तुम्हारी बहुत याद आती है
गांधी तुम्हारी याद आती है
बाबा!
एक बार फिर से आओ न
हमको फिर से 
आत्मबल,सत्य,अहिंसा,संयम
वाला
भूला पाठ पढ़ाओ न!!!

------आनन्द सावरण -----

Sunday, September 28, 2014

-----------------------क्रांति-कुल-कलियुग-कन्हैया "भगत सिंह" ---------------





ओ! युवता के 
प्रकाशस्तंभ
भगत!!

सड़क पर सोया हुआ
आदमी बुरा लगता है

ब्रांडो के पीछे भागता
युवा बुरा लगता है
रखैल से रतिरत
अधेड़ बुरा लगता है
पतले रिक्शेवाले के रिक्शे पे
बैठा मोटा बुरा लगता है



ओ!मृत्युविजेता
भगत!!


तथाकथित शाइनिंग इंडिया

अच्छे दिन,भारत निर्माण
अब बहुत बुरा लगता है
एकांगी व्यवस्था के
नियोजन से
विदर्भ,नंदीग्राम
में मरता हुआ किसान
बुरा लगता है
किसी कंपनी के प्रचार में
दांत चीयारे नायक बुरा लगता है



ओ!उच्च चेतना
भगत!!



फिर आ जाओ
करो एक धमाका फिर से
बहरों को सुनाने के लिए
बतलाने कर लिए
संवृद्धि और विकास में अंतर होता है
चेताने के लिए
संवृद्धि के बने द्वीप और
असह्य भूख से पेट पर कपडा बांधे
व्यक्ति में अंतर होता है !!!!!!



.....आनंद सावरण.....

Saturday, February 15, 2014

-------तुम हो गयी हो अब कलंकित------


                       
तुम
हो गयी हो कलंकित
यूँ अकारण अब
विलाप नहीं सुहाता 
तुम पर
तुम जाती थी
उससे मिलने,बतियाने
ऐसा क्या कह आती थी
जो मैं गा उठता था



खैर!
मेरी छोडो
अपनी समझो
सुना था तुम
क्रांति लाती हो
क्या वहां भी
कर लिया स्वत्व का सौदा


अरे कविता!!
तुम तो भावना की बहन हो
आदर्श की बेटी हो
परिस्थितियां तुमने बदली
अब ये अधोपतन


खैर!!
इसे भी छोडो
सुना था तुम
व्याकरण की
परिधि में नहीं रहती
वैयाकरणों ने
वहां भी की कोशिश
तुम्हे बांधने की
तुम भी चढ़ाई गयी
खरे और खोटे की
कसौटी पर
छीनी गयी तुम्हारी
स्वतन्त्रता


खैर!!
तुमसे इतनी उम्मीद क्यूँ??
नारी हो न
द्वापर में
कृष्णा के रहते
होगा ही चीर हरण
त्रेता में
राम ही लेंगे
तुम्हारी अग्नि परीक्षा
और कलियुग में
तुम्हारे ही रक्षक
बिकाऊ कलमची
बचा न पाएंगे
तुम्हारी अस्मिता


होगा खिलवाड़
तुम्हारे ही अंतर से
कब से रो रही हो
अब तो मौन साधो
अपनी उस
परम्परा के लिए
जिसमे कबीरा,तुलसी
और मीरा थे!!!
---आनन्द सावरण ----

Tuesday, March 6, 2012

----------मैंने देखा--------------

मैंने देखा
एक भूखा बच्चा
अपने दुर्बल माँ की छाती से लिपटा हुआ
मैंने देखा
एक प्रसिद्द साधू
सोने चांदी की कुर्सी में चिपका हुआ
मैंने देखा
एक बूढा बाप
अपने जवान बेटे की लाश उठाये हुए
मैंने देखा
एक प्रसिद्ध समाज सेवी
फर्जी संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन करवाए हुए
मैंने देखा 
एक धनी व्यक्ति
एक वैश्या पर रूपया लुटाते हुए
मैंने देखा 
एक छोटा बच्चा 
पढने की उम्र में रिक्शा चलाते हुए 
मैंने देखा 
एक धनी बुड्ढा
एक गरीब लड़की से व्याह रचाए हुए
मैंने देखा
एक आदर्श विद्यार्थी 
सिगरेटे के धुएं से छल्ले बनाए हुए  
  ----आनंद सावरण-----

Sunday, February 19, 2012

------अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा एक नहीं शत बार लिखूंगा ----

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा

नहीं करना अब कोई त्राण
वेदीबलि पर न्यौछावर प्राण 
न अब बाकी प्रमाण आना है 
अब होगा करना प्रयाण 

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा 

उत्सर्ग करना होगा तोशक
बनना है समाज का पोषक
अब नायक बन सामने आना है
छोड़ना होगा यह पात्र विदूषक 

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा 

न करना अब कोई द्वेष
उठा है अब युयुत्सा त्वेष
जीतना है,जीत  ही जाना है
जो समर पड़ा था अब तक शेष

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा 
  
अपरिभाषित भी हुआ परिभाषित 
क्रान्ति हुयी है फिर से पिपासित  
शोर्य पुत्र बन सामने आना है
सदियों का मौन भी होगा सुभाषित

अब श्रृंगार नहीं अंगार लिखूंगा
एक नहीं शत बार लिखूंगा  
----आनंद सावरण---



Sunday, January 22, 2012

पीर पुराण के आगे प्रणय गान की पुस्तक मोटी है

तेरे झूठ को भी सच
मान कर आँखे रोती हैं
सबकी सच बातें भी मेरे
विश्वास के आगे छोटी हैं  
प्रतिभा भी आज चन्द
सिक्कों के आगे छोटी होती है 
देखो आज टूटता जाता दीपक
बुझती जाती ज्योति है 
कुछ  भी हो,कैसा भी हो पर   
पीर पुराण के आगे सदैव ही 
प्रणय गान की पुस्तक मोटी है
                                         ----आनंद सावरण ----  

Friday, November 11, 2011

--------------------प्रयाण ---------------

झंझावातों
              हाहाकारों के बीच 
बुझती हुयी दीपशिखा 
सामाजिक अनाचार  
लुप्त प्राय आचार 
मूक संवेदना
                  असहाय वेदना
किंकर्तव्यविमूढ
                    न्यायपथारूढ़
कुछ कर भी पायेगा 
                     या दीपक बुझ जाएगा?
आत्मा के तेल 
                   और प्रज्ञा की बत्ती से 
                                  जलेगा
माम ओर से न बचेगा 
हाथ भी जलेगा 
                   लौ हो प्रज्वलित इतना 
                    झंझावत हो चाहे जितना
फर्क न पड़े
रहे पथ पर अड़े 
                   स्वयं को जलाओ
                   प्रकाश फैलाओ
दीप संदीप प्रज्वलित कर
बुझों को जलाओ
                   बनो ऊर्ध्वरेखा 
बनाओ प्रणेता 
व्यक्तित्व के मान का
समाज के उत्थान का
स्वतन्त्रता के गान का 
                  यही है क्षण
                तुम्हारे प्रयाण का  
                                   -----आनंद सावरण----

Thursday, September 8, 2011

---मेरे हर शब्द में तुम ही तुम समाई हो...... ---

तेरे साथ हुआ जीवन आज फूलों के रंगों में 
मन आज नाचे गोया सागर बीच तरंगों में
                                                                यौवन आ रहा आज देखो फिर से उमंगों में
                                                                भावनाएं उड़ रही हैं आज गगन बीच पतंगों में
मेरे गीतों में तुम फिर से आज आई हो
साथ तुम आज नयी फिर से महक लायी हो
                                                              मेरे अंतस की तुम बनी आज परछाईं हो
                                                              मेरे हर शब्द में तुम ही तुम समाई हो......
                                                                                                  ---आनंद सावरण ---

Wednesday, May 25, 2011

---तेरे संग हूँ, पर जो दूरी है समझता हूँ---

 तेरे संग हूँ पर जो दूरी है समझता हूँ
 कुछ तेरी कुछ अपनी मजबूरी समझता हूँ
                                                           समझ कर भी नहीं हूँ मैं कुछ भी मैं यूं समझ पाता 
                                                            मैं तुझमे खो गया इतना की खुद को पा नहीं पाता
 हो तुम मुझसे दूर पर तुमको दूर मैं मान लूं कैसे?
 मैं प्राणों को अपनी श्वासों से दूर जान लूं कैसे?
                                                            तू ही बता अब इन गीतों को मैं पहचान दूं कैसे?
                                                            तेरे ही इन गीतों को मैं अपनी तान दूं कैसे? 
                                                                                           ---आनंद सावरण---

Sunday, May 22, 2011

-----नारी सशक्तिकरण----

नारी!तुम केवल श्रद्धा हो,विश्वास रजत नग पग तल में 
पीयूष श्रोत ही बहा करो;जीवन के सुन्दर समतल में

उपर्युक्त पंक्तियाँ प्रसाद (जय शंकर प्रसाद)जी ने लिखी नहीं अपितु यह वाक्षणयमान है कि नारियों के प्रसादपर्यंत यह पंक्तियाँ उनकी लेखनी से नारी को परिभाषित करने के लिए स्वतः फूट पड़ी हैं|
नारी, त्याग,प्रेम,बलिदान,ममता,समर्पण,वफ़ा आदि भाव आत्मसात किये हुए है उसे एक शब्द में श्रद्धा कह देना ही उचित है |आज हमारे  परिवारों की धुरी भी नारी ही है|हमारे घर के पर्यावरण,सारे सामाजिक सरोकारों के पीछे भी नारी शक्ति ही विद्यमान है|नारी ही ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है |
आज से नहीं बल्कि हम ऋग्वैदिक काल को भी देखेंगे तो पायेंगे की मैत्रेयी,पुष्पा जैसी भी नारियां हमारे समाज में थीं जो अपने ज्ञान के बलबूते पर सद्भाव और वसुधैव कुटुम्बकम की बात करती थी|
नारियों को हमारे समाज में पहले से ही अच्छी स्थिति प्राप्त है|भारत में तो पहले से ही "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ,रमयंते तत्र देव " अर्थात जहां नारी  कि आराधना होती है वहाँ देवताओं का निवास होता है,को मान्यता प्राप्त है|
आज की नारी अबला नहीं अपितु सबला है|नारी की सशक्तिकरण के नाम पर उसको आरक्षण या आवश्यकता   से अधिक सुविधायें  देकर उसको कमज़ोर नहीं करना है ,बल्कि उसको और सशक्त बनाने के लिए उसके अंतर्मन को जगाना होगा उसको रानी लक्ष्मीबाई,पन्ना धाय,हाडा रानी की याद दिलानी होगी| 
आज हमारे परिवारों में भी मैत्रेयी,पुष्पा,लक्ष्मीबाई विद्यमान हैं,आवश्यकता सिर्फ उनको पहचानने की है|इसी भाव को शब्दों के माध्यम से मुखरता देते हुए किसी कवि ने कहा है-

पूरी ज़मीन साथ दे तो और बात है
हम (पुरुष ) नारियों का साथ दें तो और बात है| 
चल तो लेते हैं लोग एक पाँव  पर 
पर दूसरा साथ दे तो और बात है||  
                                               ---आनंद सावरण ---

Monday, April 18, 2011

----चाँद का मुंह टेढा है----















आसमान में चमकता चाँद 
अपनी फीकी मुस्कान संजोये 
सैलाब बनकर उमड़ता है 
लोगों की कल्पनाओं में
उनके हृदायांकुर से
फूट पड़ती हैं 
संबंधों और भावनाओं की
कपोल कल्पनाएँ
कभी मामा बनकर 
बच्चों को कराता है दुग्धपान 
तो कभी खिलौना बन 
बहलाता है उनका मन 
कभी बनता है 
प्रेमियों के लिए 
प्रेमिका का मुख मंडल
कभी बनाता है
करवाचौथ में स्त्रियों का पूज्य 
पति की उम्र बढाने को 
तो कभी बनता है पोस्टमैन 
भाइयों तक पहुचाता है
बहनों का सन्देश
पर कभी-कभी 
चाँद बनकर उभरता है
टूटे दिलों में असहनीय दर्द 
और कभी अपनी सुन्दरता के लिए
बन जाता है इर्ष्या का पात्र 
जब कहीं से कोई "मुक्तिबोध"
कहता है
चाँद का मुंह टेढा है 
                            ---आनंद सावरण ---

Sunday, April 10, 2011

---अन्ना के सत्याग्रह पर एक विचार ---

आज पता नहीं क्यों मन में यह द्वंद्व उठ रहा है,कि हमारे समाज सेवियों को अपने ही राष्ट्र,अपनी ही मिटटी,अपने ही लोगों के बीच,अपने ही देश की राजनीति से अपनी ही बात मनवाने के लिए भूख हड़ताल या सत्याग्रह जैसे आन्दोलन करने पड़ रहे हैं?आखिर क्यों आज हम अपने को इतना विवश महशूस कर रहे हैं?
आज लोग अन्ना हजारे को गांधी जी का दूसरा रूप मान रहे हैं,क्योंकि अन्ना और राष्ट्रपिता के अपनी बात मनवाने के तरीके लगभग एक सामान हैं,फर्क सिर्फ इतना है की गांधी जी अपनी बात मनवाने के लिए अंग्रेजों से,विदेशियों से सत्याग्रह करते थे और आज का गाँधी अपनों के ही सामने विवश है|
  जब आज सरकार "लोकपाल विधेयक"बनाने के लिए अन्ना के समक्ष प्रस्तुत है तो अन्ना इस सत्याग्रह को स्वतन्त्रता की दूसरी लड़ाई स्वीकार करते हैं,अब मान में यह प्रश्न स्वतः जन्म लेता है कि अपनों से कैसी स्वतंत्रता?यदि हम अपनों से स्वतंत्र होने का प्रयास करेंगे तो हम स्वतंत्र नहीं अपितु "स्वछन्द" कहलायेंगे|तब "स्वतन्त्रता" और "स्वछंदता" इन दोनों शब्दों का अर्थ ही गौण हो जाएगा|
भारतीय समाज,हमारे देशवासी,अन्ना में आज राष्ट्रपिता तलाश रहे हैं,और अन्ना हमें अपनों से ही स्वतंत्र कराने का प्रयास कर रहे हैं,तो क्या १९५० में हमारे अपने ही देश के नेताओं द्वारा,बुद्धिजीवियों द्वारा दिया गया तंत्र ही गलत है?क्या उन लोगों ने हमारे हांथों में स्वतत्रता की जगह परतंत्रता का परचम थमाया है?
लोग अन्ना जी की  तुलना गांधी जी से कर रहे हैं,गांधी जी अंग्रेजों से स्वतन्त्रता की लड़ाई लादे ठेयौर हमारे हांथों में लोकतंत्र जैसा मज़बूत तंत्र थमाए थे,तो क्या गांधी जी,आंबेडकर जी ,नेहरू जी द्वारा बनाया गया संविधान ठीक नहीं था?
आखिर क्यों?आज का गांधी (अन्ना) को अपनों से ही सत्याग्रह करना पड़ रहा है?आज का गांधी क्यों अपने आप को असहाय और विवश महशूस कर रहा है?
क्या १९५० से बनी हुयी व्यवस्था से उपजी हुयी दुर्व्यवस्था के हम ज़िम्मेदार नहीं हैं?न अपनी जगह गांधी गलत हैं और न ही अपनी जगह अन्ना गलत हैं|गांधी जी लड़े थे स्वतन्त्रता के लिए और अन्ना लड़ रहे हैं स्वतंत्र भारत में भ्रष्टाचार से स्वतन्त्रता पाने के लिये|
इस व्यवस्था से उपजी दुर्व्यवस्था के मूल में कहीं न कहीं हम स्वयं ही हैं,यहाँ इस दुर्व्यवस्था की गिरफ्त में सबसे ज्यादा आम आदमी ही है|सरकार योजनायें हमारे लिये बनाती है,जिससे हम उनका उपयोग कर के अपना जीवन व्यवस्थित धग से व्यतीत कर सकें|परन्तु ये योजनायें कब आयीं और कब गयीं किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती,क्या हममें जागरूकता की कमी नहीं है,गग्रूक्ता के मूल में शिक्षा है|आज भी हमारे देश के राष्ट्रीय राजमार्गों से ५ कि.मी. नीचे जाने पर हमें अपने देश की शिक्षा का पता लग जाता है,आज होटलों में बच्चे काम करते हुए देखे जाते हैं,हमारी सरकार ने इसके लिये भी (शिक्षा का अधिकार)योजना हमारे लिये बनाई है|जिसमें ६ से १४ वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा का निःशुल्क प्रावधान है, परन्तु हम उसका उपयोग नहीं करना जानते,जब हमारे समाज में शिक्षा नहीं होगी तो जागरूकता का प्रश्न अपने आप ही समाप्त हो जाता है,और जब जागरूकता नहीं होगी तो हम एक सही सरकार कैसे चुन सकते हैं?जब हमें ज्ञान ही नहीं है कि कौन प्रत्याशी सही है और कौन गलत?
फिर भी यह देख कर अच्छा लगता है कि हमारे देश में धीरे-धीरे पारदर्शिता बढ़ रही है|हमारे पास (सूचना का अधिकार,लोकवाणी ) जैसी शक्तियां हैं|परन्तु हम यदि शिक्षित  ही नहीं होंगे तो हमारे लिये इन प्रावधानों का क्या मतलब है?
आज हमारे देश में भ्रष्टाचार ने एक व्यापक रूप ले लिया है,यदि ध्यान देंगे तो पता लगेगा कि कहीं न कहीं इस व्यवस्था से उपजी हुयी दुर्व्यवस्था के मूल में हम लोग ही हैं,ऐसे में कोई अन्ना या गांधी क्या कर सकता है?ऐसे ही समाया का पूर्वानुमान शायद कवी इकबाल ने कर लिया था तभी उन्होंने कहा था-
     "संभल जाओ ऐ हिन्दोस्तान वालों,
      क़यामत आने वाली है 
      तुम्हारी बरबादियों के तस्करे हैं आसमानों में|
      ना संभलोगे तो मिट जाओगे एक दिन,
      तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में||" 
फिर भी आशा कि किरण अभी बाकी है.स्थिति को बद से बदतर होने से बछाया जा सकता है|लेकिन इसके लिये हमको आपसी भेदभाव भूलकर,प्रेमपूर्वक,राष्ट्रीयता के भाव में रमकर,दृढ़ प्रतिज्ञ आज एक साथ स्थितियों को बदलने का प्रयास किया जाना चाहिए|ऐसी  स्थति पर राष्ट्र कवि श्री मैथली शरण गुप्ता जी द्वारा प्रणीत नमन पंक्तियाँ अक्षरसः उपयुक्त प्रतीत होती हैं-
       "हम कौन थे, क्या हो गए हैं,और क्या होंगे अभी|
        आओ विचारें आज मिलकर हल होंगी समस्याएं सभी||"
                                                                                                                           ---आनंद सावरण ---

  

Thursday, March 31, 2011

दो चार पलों का मिला प्रकाश प्रभु से उपहार सखे
न रोको खामोशी के तालों से
भाव किरण का आना जाना 
उर विहाग को उड़ने दो
स्वछन्द विचारों के नभ में
अंतस में चमक रहा जो हीरा
मत रोको उसका बाहर आना 
                                      ---आनंद सावरण---

Tuesday, March 22, 2011

---------कशमकश --------

जिन फूलों को खिलना न था 
कैसा शिकवा उनके मुरझाने पर
जो रिश्ते कभी अपने ही न थे
कैसा शिकवा उनके टूट जाने पर
वक़्त की आंधी ने पर कतरे हों जिस तितली के
कैसी शिकायत उसके न उड़ने पर
जो वस्तु थी हमसे अधिकारातीत 
कैसा गिला उसके खो जाने पर
जिस ख़ुशी पर मेरा नाम लिखा न हो प्रभु ने
कैसा गिला उसके न मिलने पर                                             
                                          ---आनंद सावरण---

Monday, February 28, 2011

---दिल तो दे ही दिया है,जान तुझको देंगे हम---

दिल तो दे ही दिया है,जान तुझको देंगे हम
कसम खुदा की ये ईमान तुझको देंगे हम
                                                        मुझसे क्या भूल हुयी,तुने न मुझे माफ़ किया
                                                        हाय रब्बा मेरे तूने भी न इन्साफ किया
घर तो क्या छोटा सा संसार तुझको देंगे हम 
कसम खुदा की सारा प्यार तुझको देंगे हम
                                                        दिल में मेरे सपने संजोये मैंने तेरे लिए
                                                        सारी दुनिया के रंग रंगाये मैंने तेरे लिए
चाँद सूरज तो क्या आकाश तुझको देंगे हम
हज़ार रंगों की बरसात तुझको देंगे हम 
                                                        मरे प्रिये केवल मेरे पे तुम विश्वास करो
                                                        सारी दुनियां को छोड़ मेरे पे तुम आस धरो 
आदि से अंत तक सर्वस्व तुझको देंगे हम 
कसम खुदा की ये वर्चस्व तुझको देंगे हम                
                                                       ---आनंद सावरण ---

Friday, February 25, 2011

---------क्या लिखूं?--------

क्या लिखूं?
रस अलंकार जोड़कर 
या काव्यधारा छोड़कर
हुआ आज मैं असहाय
नहीं सूझ रहा कोई उपाय
शब्द नहीं रहे हैं सध
कलम गयी ही बंध
सोचता हूँ मैं पड़ा
कहाँ खो गयी मेरी प्रेरणा
लिखने का करता हूँ प्रयास
पर शब्द नहीं अब मेरे पास
जग रहा नहीं कोई भाव है
ज़िन्दगी तैरती जाती
जैसे बिन पानी के नाव है....
                                  ---आनंद सावरण---